नारी चेतना तथा महिला नेतृत्व से बदलता भारत

 

नारी चेतना तथा महिला नेतृत्व से बदलता भारत



 


नारी स्वयं शक्ति स्वरूपा है | यह शक्ति परिवार संबर्धन, समाज धारणा, राष्ट्र पुनरुत्थान और आत्म विकास के लिए विकसित की जाती है तब वह समाज में मंगलकारी शक्ति कहलाती है लेकिन जब नारी केवल अपने सुख, भोग और स्वार्थ तक ही सीमित रहती है तब वह अशुभ शक्ति कहलाती है | अत: संस्कारयुक्त शिक्षा का कार्य नारी चेतना को विकसित करके उसे अपने स्वरूप का बोध करवाकर सकारात्मक, उर्जावान महिला बनाना एवं नेतृत्व विकसित करके बदलते भारत का आधार बनना है |

भारतीय चिन्तन में महिला को सृष्टि की मूल प्रेरिक शक्ति और राष्ट्र की दिशा निर्धारित करने वाली चेतना के रूप में देखा गया है | हमारे शास्त्रों में उसे शक्ति, संवेदना, सृजन एवं संस्कार का प्रतीक माना गया है | मनु स्मृति में, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ का वर्णन है जोकि नारी सम्मान की सशक्त अवधारणा है | रामचरित मानस में, ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणो’ गोस्वामी तुलसीदास जी ने वर्णन किया है | हमारे यहाँ सीता-राम, राधा-कृष्ण, गौरी- शंकर, लक्ष्मी नारायण आदि शक्ति की प्रधानता को प्रकट करते हैं वहीं राष्ट्र पुरुष को भी भारत माता के नाम से पुकारा जाता है |

दुर्भाग्य से विदेशी आक्रान्ताओं ने इस देश में लूट-पाट ,अत्याचार, संस्कृति को लुप्त करने के प्रयास करके इस देश को पराधीन बनाए रखने का अभियान चलाया | इस काल खंड में महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, स्वतंत्रता एवं क्षमता विकास पर प्रश्न चिन्ह लग गए, परिणाम स्वरूप नारी निर्वल, पराश्रित, घर की चार दिवारी में सीमित रहने लगी | अंगेजी शासन काल में सावित्री बाई फुले, लक्ष्मी बाई, रानी चेन्नमा, सरोजनी नायडू, सुचेता कृपलानी आदि अनेकों महिलाओं ने समाज का नेतृत्व किया |

स्वतंत्रता के उपरांत नारी शिक्षा के प्रयास हुए जिसका प्रभाव आज समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलकर दिखाई देती है | आज महिलाऐं विश्व भर में चिकित्सा, न्यापालिका, शिक्षा, रक्षा, अभ्यान्त्रिकी, मीडिया आदि उच्च स्थानों पर स्थापित हैं | नारी समाज जीवन की चुनौतियों का सामना करके, विवेकपूर्ण निर्णय लेकर, परम्पराओं एवं व्यवस्थाओं का अनुशासनपूर्ण अनुकरण करती हुई समाज को दिशा दे रहीं हैं |

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की चर्चा कई दशकों से होती आ रही है | संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले, इसके लिए ‘महिला वन्दन विधेयक’ लम्बे समय से बहस का विषय बना रहा | जब भी यह मुद्दा समाने आया इसे देश की जनता विशेषकर महिलाओं ने आशा की दृष्टि से देखा है | यह महत्वपूर्ण विधेयक इस बार भी संसद में पारित नहीं हो सका जिसका प्रभाव केवल संसद तक सीमित नहीं रहा बल्कि राजनैतिक दलों की छवि, जन विश्वास और सामाजिक विश्वास पर भी पड़ा है | नारी आज केवल मतदाता नहीं है बल्कि निर्णायक राजनैतिक शक्ति बन चुकी है | राजनीती में प्रतीक एवं सन्देश अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं | महिला वन्दन विधेयक केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि महिलाओं की समाजिक प्रतिष्ठा और राजनैतिक भागीदारी का प्रतीक है | भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए महिलाओं को केवल वोट बैंक नहीं अपितु नीति निर्माण की समान भागीदार बनाना आवश्यक है |

शैक्षिक संस्थाओं में बालिका शिक्षा का स्वतंत्र पाठ्यक्रम का निर्माण, मातृ भारती, कन्या भारती का गठन आदि से विद्यालय स्तर पर ही नारी की चेतना का विकास संभव हो सकता है | विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान अपने विद्यालयों में पिछले 75 वर्षों से बालिकाओं में भारतीय दृष्टि की भावना को विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है | बालिकाओं को आत्म रक्षा, तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति तथा परम्पराओं से जुडाव की शिक्षा दे रही है | भारतीय परिवार परम्परा राष्ट्र जीवन का आधार है, इस परिवार भाव को विकसित एवं सुदृढ़ करने तथा पर्यावरण के प्रति भारतीय दृष्टि विकसित करने के लिए विद्या भारती द्वारा सप्त शक्ति संगम देश भर में आयोजित किए गए | महिलाओं को जागरूक एवं उनकी चेतना के विकास के लिए आयोजित कार्यक्रमों का नाम गीता के दसवें अध्याय में वर्णित ‘कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा’ को आधार बनाकर रखा गया | यह सात दिव्य गुण कीर्ति ,श्री ,वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा नारी में विशेष रूप से प्रतिष्ठित हैं ऐसा भगवान श्री कृष्ण जी अपनी वाणी में कहते है | यही गुण समाज के संतुलन, संवेदनशीलता और प्रकृति का आधार बनते हैं | इसी आधार पर विद्या भारती ने समाज में नारी की सकारात्मक एवं सृजनात्मक भूमिका को सशक्त बनाने, उनकी सहभागिता और सामजिक जागरूकता को केंद्र में रखते हुए महिलाओं का महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा सप्त शक्ति संगम का सूत्रपात किया |

इन कार्यक्रमों की व्यापकता और प्रभाव का अत्यंत प्रेरणादायक तथ्य यह रहा कि देश भर में 26098 कार्यक्रमों का आयोजन हुआ जिसमें सभी वर्गों से 3032490 महिलाओं की सहभागिता रही | उल्लेखनीय विषय है कि 21992 महिलाओं ने कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण एवं नागरिक कर्तव्यों विषयों का अध्ययन करके सारगर्भित विचार प्रस्तुति सभी के समक्ष रखी | सभी स्थानों पर कार्यक्रम की मुख्यातिथि, अध्यक्ष, मंच संचालक तथा व्यवस्था करने वाली टोली में महिलाऐं ही थी जोकि नारी नेतृत्व, आत्मविश्वास, सामाजिक दायित्वबोध का सशक्त उदाहरण बनीं| समाज जीवन में वशिष्ट कार्य करने वाली 53307 महिलाओं का सम्मान किया गया | इन आयोजनों के कारण समाज में नारी में सकारात्मक उर्जा, आत्मगौरव और जागरूकता का वातावरण निर्मित हुआ |

बालक के समग्र विकास में माता की भूमिका को स्पष्ट करते हुए महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में सहभागिता तथा महिलाओं को परिवार, समाज तथा देश कल्याण के कार्यों की प्रेरणा सप्त शक्ति संगम कार्यक्रम बने | देशभर में शिक्षा संस्थानों के माध्यम से मातृ शक्ति में आत्मगौरव एवं महिलाओं की सक्रियता को बढ़ावा देकर नारी चेतना का विकास राष्ट्रीय चेतना के विकास का पर्याय बन सकता है |

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