विज्ञानमय कोष

 



विज्ञानमय कोष


अन्नमय, प्राणमय और मनोमय इन तीनों कोशों के उपरान्त आत्मा का चौथा आवरण, गायत्री का चौथा मुख विज्ञानमय कोश है। आत्मोन्नति की चतुर्थ भूमिका में विज्ञानमय कोश की साधना की जाती है।
विज्ञान का अर्थ है -विशेष ज्ञान। साधारण ज्ञान के द्वारा हम लोक-व्यवहार को अपनी शारीरिक, व्यापारिक, सामाजिक, कलात्मक, धार्मिक समस्याओं को समझते हैं। स्थूल में इसी साधारण ज्ञान की शिक्षा मिलती है। राजनीति, अर्थशास्त्र, शिल्प, रसायन, चिकित्सा, संगीत, वक्तृत्व, लेखन, व्यवसाय, कृषि, निर्माण, उत्पादन आदि विविध बातों की जानकारी विविध प्रकार से की जाती है। इन जानकारियों के आधार पर शरीर से सम्बन्ध रखने वाला सांसारिक जीवन चलता है। जिसके पास ये जानकारियाँ जितनी अधिक होंगी, जो लोक-व्यवहार में जितना अधिक प्रवीण होगा, उतना ही उसका सांसारिक जीवन उन्नत, यशस्वी, प्रतिष्ठित, सम्पन्न एवं ऐश्वर्यवान होगा। किन्तु इस साधारण ज्ञान का परिणाम स्थूल शरीर तक ही सीमित है। आत्मा का उससे कुछ हित सम्पादन नहीं हो सकता। देखा जाता है कि कई व्यक्ति धनवान्, प्रतिष्ठित, नेता और गुणवान् होते हुए भी आत्मिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं। कई- कई  मनुष्य आत्मा-परमात्मा के बारे में बहुत बातें करते हैं। ईश्वर, जीव, प्रकृति, वेदान्त, योग आदि के बारे में बहुत-सी बातें पढ़-सुनकर अपनी जानकारी बढ़ा लेते हैं और बड़ी-बड़ी बातें बढ़-चढ़कर करते हैं तथा साथियों पर अपनी विशेषता की छाप जमाते हैं। इतना करते हुए भी वस्तुत: उनकी आत्मिक धारणाएँ बड़ी निर्बल होती हैं। श्रद्धा और विश्वास की दृष्टि से उनकी स्थिति साधारण लोगों से कुछ अच्छी नहीं होती। गीता, उपनिषद्, रामायण, वेदशास्त्र आदि सद्ग्रन्थों के पढ़ने एवं सत्पुरुषों के प्रवचन सुनने से आत्मिक विषयों की जानकारी बढ़ती है, जो उस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले जिज्ञासुओं के लिए आवश्यक भी है। परन्तु इन विषयों की विस्तृत जानकारी प्राप्त होने पर भी यह आवश्यक नहीं कि उस व्यक्ति को आत्मज्ञान हो ही जाए।  इसमें तो सन्देह नहीं कि शिक्षा प्राप्त करना, भाषा ज्ञान, शास्त्राध्ययन आदि जीवन के विकास के लिए आवश्यक हैं और इनके द्वारा आध्यात्मिक प्रगति में भी सहायता मिलती है। प्रत्येक व्यक्ति कबीर, रैदास और तुकाराम की तरह सामान्य प्रेरणा पाकर ही आत्मज्ञानी नहीं बन सकता। पर वर्तमान समय में लोगों ने भौतिक जीवन को इतना अधिक महत्त्व दे दिया है, धनोपार्जन को वे इतना सर्वोपरि गुण मानते हैं कि अध्यात्म की ओर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती, उलटा वे उसे अनावश्यक समझने लग जाते हैं। इस पुस्तक के आरम्भ में वरुण और भृगु की कथा दी गई है। भृगु पूर्ण विद्वान् थे, वेद-वेदान्तों के पूरे ज्ञाता थे, फिर भी वे जानते थे कि मुझे आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, विज्ञान प्राप्त नहीं है। इसलिए वरुण के पास जाकर उन्होंने प्रार्थना की कि ‘हे भगवान्! मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश दीजिए।’ वरुण ने भृगु को कोई पुस्तक नहीं पढ़ाई और न कोई लम्बा-चौड़ा प्रवचन ही सुनाया, वरन् उन्होंने आदेश दिया—‘तप करो।’ तप करने से एक-एक कोश को पार करते हुए क्रमश: उन्होंने ब्रह्म को प्राप्त किया। ऐसी ही अनेक कथाएँ हैं। उद्दालक ने श्वेतकेतु को, ब्रह्मा ने इन्द्र को, अंगिरा ने विवस्वान को इसी प्रकार तप करके ब्रह्म को जानने का आदेश दिया था। ज्ञान का अभिप्राय है-जानकारी। विज्ञान का अभिप्राय है-श्रद्धा, धारणा, मान्यता, अनुभूति। आत्मविद्या के सभी जिज्ञासु यह जानते हैं कि ‘आत्मा अमर है, शरीर से भिन्न है, ईश्वर का अंश है, सच्चिदानन्द स्वरूप है’, परन्तु इस जानकारी का एक कण भी अनुभूति भूमिका में नहीं होता। स्वयं को तथा दूसरों को मरते देखकर हृदय विचलित हो जाता है। शरीर के लाभ के लिए आत्मा के लाभों की उपेक्षा प्रति क्षण होती रहती है। दीनता, अभाव, तृष्णा, लालसा हर घड़ी सताती रहती है। तब कैसे कहा जाए कि आत्मा की अमरता, शरीर की भिन्नता तथा ईश्वर के अंश होने की मान्यता पर हमें श्रद्धा है, आस्था, विश्वास है?  अपने सम्बन्ध में तात्त्विक मान्यता स्थिर करना और उसका पूर्णतया अनुभव करना यही विज्ञान का उद्देश्य है। आमतौर से लोग अपने को शरीर मानते हैं। स्थूल शरीर-से जैसे कुछ हम हैं, वही उनकी आत्म-मान्यता है। जाति, वंश, प्रदेश, सम्प्रदाय, व्यवसाय, पद, विद्या, धन, आयु, स्थिति, लिंग आदि के आधार पर वह मान्यता बनाई जाती है कि मैं कौन हूँ। यह प्रश्न पूछने पर कि ‘आप कौन हैं’ लोग इन्हीं बातों के आधार पर अपना परिचय देते हैं। अपने को समझते भी वे यही हैं। इस मान्यता के आधार पर ही अपने स्वार्थों का निर्धारण होता है। जिस स्थिति में स्वयं हैं, उसी स्थिति का अहंकार अपने में जाग्रत् होता और स्थिति तथा अहंकार की पूर्ति, तुष्टि तथा सन्तुष्टि जिस प्रकार होनी सम्भव दिखाई पड़ती है, वही जीवन की अन्तरंग  नीति बन जाती है। बाहर से लोग धर्म और सदाचार की, सिद्धान्तों और आदर्शों की बातें करते रहते हैं, पर उनका अन्त:करण उसी दिशा में काम करता है जिस ओर उनकी जीवन-नीति प्रेरणा देती है। जब अपने को शरीर मान लिया गया है, तो शरीर का सुख ही अभीष्ट होना चाहिए। इन्द्रिय भोगों की, मौज-मजे की, मान-बड़ाई की, ऐश-आराम की प्राप्ति ही शरीर का सुख है। इन सुखों के लिए धन की आवश्यकता है। अस्तु, धन को अधिक से अधिक जुटाना और भोग-ऐश्वर्य में निमग्न रहना यही प्रधान कार्यक्रम हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो किया जाता है, वह तो एक प्रकार की तफरीह के लिए, विनोद के लिए होता है। ऐसे लोग कभी-कभी धर्मचर्चा या पूजा-पाठ भी करते देखे जाते हैं। यह उनका मन बहलाव मात्र है। स्थिर लक्ष्य तो उनका वही रहेगा जो आत्म-मान्यता के आधार पर निर्धारित किया गया है। आमतौर से आज यही भौतिक दृष्टि सर्वत्र दृष्टिगोचर है। धन और भोग की छीना-झपटी में लोग एक-दूसरे से बाजी मारने में इसी दृष्टिकोण के कारण जी-जान से जुटे हुए हैं। परिणाम स्वरूप जिन कलह-क्लेशों का सामना करना पड़ रहा है, वह सामने है। विज्ञान इस अज्ञान रूपी अन्धकार से हमें बचाता है। जिस मनोभूमि में पहुँचकर जीव यह अनुभव करता है कि ‘मैं शरीर नहीं, वस्तुत: आत्मा ही हूँ’, उस मनोभूमि को विज्ञानमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश में जब तक जीव की स्थिति रहती है, तब तक वह अपने को स्त्री-पुरुष, मनुष्य, पशु, मोटा-पतला, पहलवान, काला, गोरा आदि शरीर सबन्धी भेदों से पहचानता है। जब प्राणमय कोश में जीव की स्थिति होती है, तो गुणों के आधार पर अपनत्व का बोध होता है। शिल्पी, संगीतज्ञ, वैज्ञानिक, मूर्ख, कायर, शूरवीर, लेखक, वक्ता, धनी, गरीब आदि की मान्यताएँ प्राण भूमिका में होती हैं। मनोमय कोश की स्थिति में पहुँचने पर अपने मन की मान्यता स्वभाव के आधार पर होती है। लोभी, दम्भी, चोर, उदार, विषयी, संयमी, नास्तिक, आस्तिक, स्वार्थी, परमार्थी, दयालु, निष्ठुर आदि कर्त्तव्य और धर्म की औचित्य-अनौचित्य  सम्बन्धी मान्यताएँ जब अपने सम्बन्ध में बनती हों, उन्हीं पर विशेष ध्यान रहता हो, तो समझना चाहिए कि जीव मनोमय भूमिका की तीसरी कक्षा में पहुँचा हुआ है। इससे चौथी कक्षा विज्ञान भूमिका है, जिसमें पहुँचकर जीव अपने को यह अनुभव करने लगता है कि मैं शरीर से, गुणों से, स्वभाव से ऊपर हूँ; मैं ईश्वर का राजकुमार, अविनाशी आत्मा हूँ। जीभ से अपने को आत्मा कहने वाले असंख्य लोग हैं, उन्हें आत्मज्ञानी नहीं कह सकते। आत्मज्ञानी वह है जो दृढ़ विश्वास और पूर्ण श्रद्धा के साथ अपने भीतर यह अनुभव करता है—‘‘मैं विशुद्ध आत्मा हूँ, आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं। शरीर मेरा वाहन है। प्राण मेरा अस्त्र है। मन मेरा सेवक है। मैं इन सबसे ऊपर, इन सबसे अलग, इन सबका स्वामी आत्मा हूँ। मेरे स्वार्थ इनसे अलग हैं, मेरे लाभ और स्थूल शरीर के लाभों में, स्वार्थों में भारी अन्तर है।’’ इस अन्तर को समझकर जीव अपने लाभ, स्वार्थ, हित और कल्याण के लिए कटिबद्ध होता है, आत्मोन्नति के लिए अग्रसर होता है, तो उसे अपना स्वरूप और भी स्पष्ट दिखाई देने लगता है। विज्ञानमय कोश की चतुर्थ भूमिका में पहुँचे हुए जीव का दृष्टिकोण सांसारिक जीवों से भिन्न होता है। गीता में योगी का लक्षण बताया गया है कि जब सब जीव सोते हैं, तब योगी जागता है और सब जीव जब जागते हैं, तब योगी सो जाता है। इन आलंकारिक शब्दों में रात को जागने और दिन में सोने का विधान नहीं है, वरन् यह बताया गया है कि जिन चीजों के लिए साधारण लोग बेतरह इच्छुक, प्यासे, लालायित, सतृष्ण और आकांक्षी रहते हैं, योगी का मन इधर से फिर जाता है; क्योंकि वह देखता है कि कामिनी और कञ्चन की माया शरीर को गुदगुदाती है, पर आत्मा को ले बैठती है। इससे क्षणिक सुख के लिए स्थिर आनन्द का नाश करना उचित नहीं है। जिन धन-सन्तान, कुटुम्ब-कबीला, शत्रु-मित्र, हानि-लाभ, आगा-पीछा, निन्दा-स्तुति आदि की समस्याओं में साधारण लोग बेतरह फँसे रहते हैं, ये बातें योगियों के लिए अबोध बच्चों की ‘बालक्रीड़ा’ से अधिक कुछ भी महत्व की दिखाई नहीं देतीं; इसलिए वे उनकी ओर से उदास हो जाते हैं। वे इस झमेले को बहुत कम महत्त्व देते हैं। फलस्वरूप यह समस्याएँ उनके लिए अपने आप सुलझ जाती हैं या समाप्त हो जाती हैं। जिन कार्यों में, विचारों में कामी लोग, मायाग्रस्त व्यक्ति अत्यन्त मोहग्रस्त होकर चिपके रहते हैं, उनकी ओर से योगी मुँह फेर लेते हैं। इस प्रकार वे वहाँ सोये हुए माने जाते हैं, जहाँ कि अन्य जीव जागते हैं। इसी प्रकार जिन कार्यों की ओर, संयम, त्याग, परमार्थ, आत्मलाभ की ओर सांसारिक जीवों का बिलकुल ध्यान नहीं होता, उनमें योगी दत्तचित्त होकर संलग्न रहते हैं। इस स्थिति के बारे में ही गीता में कहा गया है कि जब जीव सोते हैं, तब योगी जागते हैं। शरीर यात्रा के लिए प्राय: सभी मनुष्यों को मिलता-जुलता कार्यक्रम रखना पड़ता है, पर योगी और भोगी के जीवन तथा रीति में भारी अन्तर होता है। प्राय: सभी लोग तड़के नित्यकर्म से निवृत होते और भोजन करके काम में लगते हैं। शाम तक जो श्रम करना पड़ता है, उसमें से अधिकांश समय अन्न, वस्त्र और जीवन आश्रितों की व्यवस्था में लग जाता है। शाम को फिर नित्यकर्म, भोजन और रात को सो जाना। इस धुरी पर सबका जीवन घूमता है, परन्तु अन्त:स्थिति में जमीन-आसमान का  भेद है। एक मनुष्य अपने शरीर के लिए धन और भोग इकट्ठे करने की योजना सामने रखकर अपने हर विचार और कार्य को करता है, जबकि दूसरा अपने आत्मा को समझकर आत्मकल्याण की नीति पर चलता है। ये विभिन्न दृष्टिकोण ही एक के कामों को पुण्य एवं यज्ञ बना देते हैं और दूसरे के काम पाप एवं बन्धन बन जाते हैं। आत्मज्ञान, आत्मसाक्षात्कार, आत्मलाभ, आत्मप्राप्ति, आत्मदर्शन, आत्मकल्याण को जीवन लक्ष्य माना गया है। यह लक्ष्य तभी पूरा होता है जब हमारी अन्त:चेतना अपने बारे में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास-भावना के साथ यह अनुभव करे कि मैं वस्तुत: परब्रह्म परमात्मा की अविच्छिन्न अंश, अविनाशी आत्मा हूँ। इस भावना की पूर्णता, परिपक्वता एवं सफलता का नाम ही आत्मसाक्षात्कार है। आत्मसाक्षात्कार की चार साधनाएँ नीचे दी जाती हैं—(१) सोऽहं साधना, (२) आत्मानुभूति, (३) स्वर संयम, (४) ग्रन्थिभेद ।   ये चारों ही विज्ञानमय कोश को प्रबुद्ध करने वाली हैं।

                             विश्वामित्र के अनुसार विज्ञानमय कोष

भारतवर्ष में छठी इन्द्रिय अथवा दशम द्वार के बारे में भाँति-2 की ऋद्धि-सिद्धियों के बारेमें बहुत सुना जाता है ये सब विज्ञानमय कोष के अन्र्तगत आते है। कुण्डलिनी शक्ति काजागरण भी विज्ञानमय कोष के जागरण का ही खेल है लौकिक मनुष्य का विज्ञानमय अल्पविकसित होता है क्योंकि इसको विकसित करना दुष्कर कार्य है लौकिक सफलताँए अर्जितकरना इसकी तुलना में आसान होता है क्योकि विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने के लिएअधिक संयम, अधिक पुरूषार्थ, तप शक्ति, दिव्य गुणो की आावश्यकता होती है। विज्ञानमयकोष को जाग्रत करने वाले व्यक्ति को साधक, तपस्वी, देवमानव, सिद्ध पुरूष, योगी, ऋषिआदि उपाधि से विभूषित किया जाता है। विज्ञानमय कोष के साधक में प्रज्ञा अर्थात पराज्ञानउपलब्ध होना प्रारम्भ हो जाता है वह अपना जीवन दैवी प्रेरणा के आधार पर जीता है। न तोवह अपनी चित्त् का दास होता है न वह बाहारी वातावरण से प्रभावित हो पाताहै अपितु अपनी अन्तरात्मा के द्वारा उपलब्ध विशेष ज्ञान द्वारा वह नियन्त्रित, संचालितहोता है। सामान्य मानव जहाँ चित्त्ा वृ​ित्त्ायों का गुलाम होकर रोग, शोक, भोग में लिप्तरहता है वहाँ विज्ञानमय कोष का धनी विभिन्न परालौकिक शक्तियों का स्वामी होता है वदूसरे व्यक्तियों को भी अनुदान वरदान देने की सामथ्र्य रखता है।

विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने के अधिकारी कम व्यक्ति होते है इसको जाग्रत करने केलिए पहले व्यक्ति किसी बाहारी स्तोत्र जैसे सदगुरू से प्रेरणा लेकर मनोमय कोष को शुद्धकरने का प्रयास करता है चित्त्ा की वृ​ित्त्ायों की गुलामी छोड़कर अन्तरात्मा की आवाजको सुनने का प्रयास करता है।

मानव के भीतर विभिन्न प्रकार के शक्ति के स्त्रोत, ज्ञान के स्त्रोत भरे पड़े है उन सभी काअनावरण कर ज्ञानवान, शक्तिवान बनना ही विज्ञानमय कोष के अन्तर्गत आता है। पुस्तकोंद्वारा उपलब्ध ज्ञान व्यक्ति को भटका सकता है परंतु अन्तरात्मा द्वारा उपलब्ध यह ज्ञानबहुत ही पवित्र होता है व साधक को बहुत सन्तुष्ठि, तृष्ठि प्रदान करता है। इस कोष केजागरण से विशेष ज्ञान, सात लोको, “ाटचक्रों व समस्त ऋद्धियों-सिद्धियों का विज्ञानप्रकट हो जाता है इसी कारण इस कोष का नाम विज्ञानमय कोष रखा गया है। लौकिक ज्ञानविज्ञान का अर्जन मनोमय कोष के अनावरण से सम्भव है जबकि परालौकिक ज्ञान विज्ञानविज्ञानमय कोष द्वारा सम्भव है।

                              योग विज्ञान के अनुसार

 

विज्ञानमय कोष : शरीर की चौथी परत को कैसे करें स्पर्श?

 

 

 

योग विज्ञान के अनुसार हमारे शरीर की पांच परतें होतीं हैं। अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञान मय कोष, आनंद मय कोष। अन्नमय कोष हमारा भौतिक शरीर होता है, और मनोमय कोष हमारे विचार। और प्राण मय कोष जीवन ऊर्जा होती है जिसे योग अभ्यासों के द्वारा स्पर्श किया जाता है। कैसे स्पर्श कर सकते हैं विज्ञान मय कोष को?

शरीर के चौथे कोष – विज्ञानमय कोष की प्रकृति

विज्ञानमय कोश बिल्कुल अलग प्रकृति का है। अंग्रेजी में इसके लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं है, इसलिए इसे आम तौर पर ईथरिक बॉडी (सूक्ष्म शरीर) या आध्यात्मिक काया कहते हैं। यह एक अस्थायी शरीर होता है क्योंकि यह स्थूल से सूक्ष्म प्रकृति में विचरण करता है। मध्यवर्ती स्थान या मध्यवर्ती स्थिति को व्योम या “विज्ञान” कहा जाता है।

विज्ञानमय कोष का रूपांतरण सदा के लिए होता है

यह वह आयाम है, जहां रूपांतरण होने पर वह वास्तव में हमेशा के लिए होता है। मान लीजिए, हमने आपके शरीर को योग करना सिखाया। यदि आप छह महीने तक आसन करें, तो आप शारीरिक, मानसिक और हर रूप में बेहतर महसूस करेंगे। लेकिन यदि आपने आगे के छह महीने उसे छोड़ दिया, तो आप एक बार फिर से अपनी पुरानी स्थिति में लौट आएंगे।

यह वह आयाम है, जहां रूपांतरण होने पर वह वास्तव में हमेशा के लिए होता है।

स्थूल शरीर के स्तर पर आप जो भी करेंगे, उसे आसानी से पलटा जा सकता है। यदि आप एक अलग नजरिये से जीवन को देखने के लिए अपने मन को तैयार करें, तो आपको महसूस होगा कि आपका नया जन्म हुआ है। लेकिन आप आसानी से अपने पुराने तरीकों पर लौट सकते हैं। आप शारीरिक और मानसिक स्तर पर जो भी करते हैं, उसे आसानी से पलटा जा सकता है यदि वह व्यक्ति उस दिशा में नहीं जाना चाहता। मान लीजिए आप प्राणायाम या क्रियाओं से प्राण ऊर्जा में बदलाव ले आते हैं, तो यह बदलाव अधिक समय तक चलेगा लेकिन कुछ समय बाद वह भी वापस हो जाएगा।

सिर्फ गुरु विज्ञानमय कोष को स्पर्श करता है, शिक्षक नहीं

यदि आप सूक्ष्म शरीर में जरूरी बदलाव लाते हैं, तो वह हमेशा के लिए होता है। यह जीवन और उसके आगे की दुनिया के लिए होता है, कुछ भी नहीं बदलता। एक गुरु और एक शिक्षक के बीच सिर्फ यही अंतर है, शिक्षक आपको ऐसे तरीके सिखाएगा जिनसे आप अपने अन्नमय कोश, मनोमय कोश और प्राणमय कोश को बदल सकते हैं लेकिन वह आपके विज्ञानमय कोश को स्पर्श नहीं कर सकता। गुरु विज्ञानमय कोश पर काम करता है। इस कोश को स्पर्श करने के बाद, सब कुछ पूरी तरह बदल जाता है क्योंकि यह बदलाव स्थायी होता है। यह शारीरिक आयाम से परे होता है और हमेशा स्थायी होता है।

हमारा अनुभव आनंदमय बनाता है ये कोष

उदाहरण के लिए, यदि आप चीनी के बारे में बात कर रहे हैं, तो आप कहते हैं कि वह मीठी है। मिठास चीनी का स्वभाव नहीं है। मिठास वह अनुभव है, जो वह आपके भीतर उत्पन्न करती है। जब आप उसे अपने मुंह में रखते हैं, तो आपको उसका स्वाद मीठा लगता है, इसलिए आप उसे मीठा कहते हैं। ठीक इसी तरह, आनंद हमारी सबसे अंदरूनी परत का स्वभाव नहीं है। वह शारीरिक नहीं है, जो भी चीज शरीर की सीमा से आगे है, हम उसकी व्याख्या या वर्णन नहीं कर सकते, इसलिए हम बच्चे की भाषा में बोलते है। मान लीजिए यहां एक स्पीकर सिस्टम है, और एक बच्चा आकर उसे छूता है। वह नहीं जानता कि वह क्या चीज है, इसलिए वह कहता है, “बूम बूम बूम”। अमेरिका में उसे बूम बॉक्स कहते हैं। यह एक बच्चे की भाषा है। इसी तरह, इसे आनंदमय शरीर कहना बच्चे की भाषा है। हम उसके बारे में बात करते समय उसकी प्रकृति की नहीं, अपने अनुभव की बात करते हैं।

इसे स्पर्श करने के लिए तीनों भौतिक शरीर संरेखित होने चाहिए

अगर शरीर के तीन स्थूल या भौतिक आयाम सीध में नहीं हैं, तो आप कभी इस अंतरतम को स्पर्श नहीं कर सकते। योग इन तीनों को सीध में लाना है ताकि आप अंतरतम तक पहुंच सकें। एक बार इसे स्पर्श करने के बाद, आप स्वभाव से ही आनंदित हो जाएंगे।

अगर शरीर के तीन स्थूल या भौतिक आयाम सीध में नहीं हैं, तो आप कभी इस अंतरतम को स्पर्श नहीं कर सकते। योग इन तीनों को सीध में लाना है ताकि आप अंतरतम तक पहुंच सकें।

आनंदित होना पूरी तरह स्वाभाविक हो जाता है। आप अपनी जिन्दगी के हर क्षण में उत्साहित और आनंदित हो सकते हैं। सबसे बढ़कर, जब आप जीवन के अदैहिक आयाम को स्पर्श करते हैं, तभी आप आध्यात्मिक हो सकते हैं। यदि ये तीनों उपयुक्त सीध में हों, तो आपकी जीवन यात्रा पूरी तरह सहज हो जाती है और बिना किसी तनाव या खिंचाव के अपनी पूर्ण संभावना तक पहुंचती है। आप इस जीवन को इस तरह जी सकते हैं कि जीवन की प्रक्रिया आपके ऊपर एक भी खरोंच न डाल पाए। आप जिस रूप में चाहें, जीवन के साथ खेल सकते हैं लेकिन जीवन आपके ऊपर कोई खरोंच नहीं छोड़ सकती। हर मनुष्य इस तरह जीने में समर्थ है।

इसे स्पर्श करने में सभी बराबर समर्थ हैं

जब बाहरी हकीकतों की बात होती है, तो हममें से हर कोई अलग-अलग रूप में सक्षम है, लेकिन जब अंदरूनी सच्चाई की बात होती है, तो हम सब बराबर समर्थ हैं। लोग उसका लाभ इसलिए नहीं उठा पाते क्योंकि वे उस दिशा में कोशिश नहीं करते। वे कभी अंतर्मन की ओर ध्यान नहीं देते। वे हमेशा यह मानते हैं कि यदि हम बाहरी चीजों को ठीक कर लें, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन दुनिया के संपन्नि वर्ग इस बात को साबित करते हैं कि बाहरी चीजों को ठीक करना जीवन के लिए पर्याप्त नहीं है। आपको अपने लिए भी कुछ करने की जरूरत होती है। अपने अंतरतम को ठीक करने के बाद, बाहरी स्थितियां चाहे जो हों, आप एक पूर्ण जीवन जी सकते हैं। यदि आपका अंतर ठीक नहीं है, तो चाहे बाहरी स्तर पर हम कोई भी उपलब्धि हासिल कर लें, सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। लोग बहुत मेहनत से कामयाबी हासिल करते हैं लेकिन फिर उन्हें कामयाबी को सहन करना पड़ता है। वे वहां तक पहुंचने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, लेकिन एक बार वहां तक पहुंचने के बाद, वे उसका आनंद नहीं उठा पाते, वे उसे सहन करते हैं क्योंकि अंतर की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता।

जीवन की गुणवत्ता भीतरी स्थिति से निर्धारित होती हैयह समझने के लिए मनुष्य को एक खास जागरूकता की जरूरत होती है कि उसके जीवन का मूल तत्व, उसके जीवन की गुणवत्ता बाहरी चीजों से तय नहीं होती बल्कि उसके अंतरतम से निर्धारित होती है। इसका पूरी तरह गलत अर्थ निकाला गया है।

यह समझने के लिए मनुष्य को एक खास जागरूकता की जरूरत होती है कि उसके जीवन का मूल तत्व, उसके जीवन की गुणवत्ता बाहरी चीजों से तय नहीं होती बल्कि उसके अंतरतम से निर्धारित होती है।

लोगों ने यह मान लिया कि यदि आपको आध्यात्मिक राह पर चलना है, तो आपको सभी बाहरी चीजों का त्याग करना होगा। यह छोड़ने या न छोड़ने की बात नहीं है। चाहे आप आध्यात्मिक हों या नहीं, आप सांस लेते हैं, खाना खाते हैं और पानी पीते हैं। आप सिर्फ यही चुन सकते हैं कि आप अच्छा खाना खाते हैं या खराब खाना। इसलिए यह त्यागने या छोड़ने की बात नहीं है। यह अपने ध्यान को दूसरी तरफ ले जाना है, जहां आप देख सकें कि यदि आपने अपने अंतरतम को सही तरीके से नहीं संभाला, तो आपके जीवन की गुणवत्ता अच्छी नहीं हो सकती।

बिना भीतरी आनंद के सब व्यर्थ हो जाता है

आपके जीवन की गुणवत्ता इससे तय नहीं होती कि आप कैसे कपड़े पहनते हैं, कौन सी कार चलाते हैं या किस तरह के घर में रहते हैं। यह इससे तय होती है कि आप अंदर से कितने शांत और आनंदित हैं। यही मूल रूप से आपके जीवन की गुणवत्ता है। बाकी हर चीज वहां पहुंचने के लिए की जाती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो बाकी सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।

विज्ञानमय कोश इससे भी ऊँची स्थिति है। इसे भाव-संवेदना का स्तर कह सकते हैं । दूसरों के सुख-दुख में भागीदार बनने की सहानुभूति के आधार पर इसका परिचय प्राप्त किया जा सकता है। आत्मभाव का आत्मीयता का विस्तार इसी स्थिति में होता है। अन्तःकरण विज्ञानमय कोश का ही नाम है। दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी, शालीन और परोपकार परायण व्यक्तियों का अन्तराल ही विकसित होता है। उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रियाकलाप अपनाने की महानता इसी क्षेत्र में विकसित होती है। महामानवों का यही स्तर समुन्नत रहता है। चेतना का यह परिष्कृत स्तर सुपर ईगो, उच्च अचेतन, आदि नामों से जाना जाता है। इसकी गति सूक्ष्म जगत में होती है। वह ब्रह्माण्डीय सूक्ष्म चेतना के साथ अपना सम्पर्क साध सकती है। अदृश्य आत्माओं, अविज्ञात हलचलों और अपरिचित संभावनाओं का आभास इसी स्थिति में मिलता है। अचेतन ही वस्तुतः व्यक्तित्व का मूलभूत आधार होता है। इस अचेतना का अभीष्ट उपयोग कर सकना परिष्कृत विज्ञानमय कोश के लिए ही संभव होता है।

 

मन में ही स्थित है विज्ञानमय कोष अर्थात ‍बुद्धि का स्तर। जो विचारशील और कर्मठ है वही विज्ञानमय कोष के स्तर में है। इस ‍विज्ञानमय कोष के भी कुछ उप-स्तर है। विज्ञानमय कोष में ही स्थित है-आनंदमय कोष। यही आत्मवानों की ‍तुरीय अवस्था है। इसी ‍स्तर में जीने वालों को भगवान, अरिहंत या संबुद्ध कहा गया है। इस स्तर में शुद्ध आनंद की अनुभूति ही बच जाती है। जहाँ व्यक्ति परम शक्ति का अनुभव करता है। इसके भी उप-स्तर होते हैं। और जो इस स्तर से भी मुक्त हो जाता है-वही ब्रह्मलीन कहलाता है।

 

ईश्वर एक ही है किंतु आत्माएँ अनेक। यह अव्यक्त, अजर-अमर आत्मा पाँच कोषों को क्रमश: धारण करती है, जिससे की वह व्यक्त (दिखाई देना) और जन्म-मरण के चक्कर में उलझ जाती है। यह पंच कोष ही पंच शरीर है। कोई आत्मा किस शरीर में रहती है यह उसके ईश्‍वर समर्पण और संकल्प पर निर्भर करता है।

 

चार स्तर : छांदोग्य उपनिषद (8-7) के अनुसार आत्मा चार स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है- (1)जाग्रत (2) स्वप्न (3) सुषुप्ति और (4) तुरीय अवस्था।

 

इसमें तीन स्तरों का अनुभव प्रत्येक जन्म लिए हुए मनुष्य को अनुभव होता ही है लेकिन चौथे स्तर में वही होता है जो ‍आत्मवान हो गया है या जिसने मोक्ष पा लिया है। वह शुद्ध तुरीय अवस्था में होता है जहाँ न तो जाग्रति है, न स्वप्न, न सु‍षुप्ति ऐसे मनुष्य सिर्फ दृष्टा होते हैं-जिसे पूर्ण-जागरण की अवस्था भी कहा जाता है।

 

 धर्म विज्ञान(उपनिषद्)

वेदों में जो दध्यङ्ग शब्द प्रकट हुआ है, उसे ही पुराणों में दधीचि नाम दिया गया है । अतः दधीचि को समझने के लिए दध्यङ्ग को समझना होगा । वैदिक अनुसन्धान के आधार पर आनन्दमय कोश के आनन्द को पयः(दुग्ध) कहते हैं । जब इस पयः का अवतरण (declination) विज्ञानमय कोश में होता है, तब वह पयः अर्थात् दुग्ध ही रूपांतरित होकर दधि बन जाता है । विज्ञानमय कोश की जो चेतना इस दधि को धारण करती है, वही दध्यङ्ग अथवा दधीचि है । इस प्रकार विज्ञानमय कोश की चेतना दधीचि ऋषि है और दधीचि ऋषि की अस्थियों को धारण करने का अर्थ है - मनोमय कोश से ऊपर उठकर विज्ञानमय कोश के अस्तित्व को धारण करना । मन - वचन - कर्म अथवा भाव - ज्ञान - क्रिया शक्तियों की एकाकारता ही विज्ञानमय कोश का अस्तित्व है । अर्थात् जब तक मनुष्य मनोमय कोश में स्थित रहता है, तब तक उसकी मन - वचन - कर्म अथवा भाव - ज्ञान - क्रिया शक्तियां पृथक् - पृथक् होकर बिखरी रहती हैं, परन्तु मनोमय कोश से ऊपर उठकर विज्ञानमय में पहुंचने पर ये तीनों पृथक् - पृथक् शक्तियां एकाकारता को प्राप्त होकर एक हो जाती हैं । वेदों में इन तीनों शक्तियों को मन - प्राण - वाक् भी कहा गया है । अब विज्ञान व् विज्ञानमय कोष वस्तुतः है क्या इसपर दृष्टिपात करते हैं।

योगिराज श्री अरविन्द व् श्रुति (उपनिषद्) की संकल्पना के अनुसार:-

विज्ञान केवल सत्य चेतना ही नहीं बल्कि सत्य-शक्ति भी है, वह अनंत और दिव्य प्रकृति की अपनी वास्तविक क्रिया है; वह एक दिव्य ज्ञान है जो स्वाभाविक, ज्योतिर्मय और अटल आत्म-चरितार्थता के बल और आनंद में दिव्य संकल्प के साथ एक है । अतएव, विज्ञान के द्वारा हम मानवी प्रकृति को हम दैवी प्रकृति में परिणत कर सकते हैं । 

विज्ञान केवल अनंत सत्-तत्व का घनीभूत चैतन्य ही नहीं है, इसके साथ-साथ यह अनंत की असंख्यविध लीला का अनंत ज्ञान भी है । समस्त विचारणा इसमे निहित है, न केवल मानसिक बल्कि अतिमानसिक भी; परन्तु यह विचारणाओं के द्वारा सीमित नहीं होता क्योंकि यह समस्त विचारणात्मक क्रियाओं के बहुत परे है ।

मनोमय सत्ता से विज्ञानमय सत्ता में उत्क्रमण , योग व् अध्यात्म में एक महान व् निर्णायक उत्क्रमण है । यहाँ मनोमय मानव जोकि हम हैं विज्ञानमय पुरुष अर्थात सत्य सचेतन दिव्य सत्ता में परिणत हो जाता है । अपने आरोहण के उस धरातल पर अवस्थित होने पर हम विश्वात्मा की इस अन्नमय,प्राणमय, मनोमय स्थिति से सर्वथा भिन्न स्थिति में पहुँच जाते हैं और इसी परिवर्तन के साथ अपनी आत्मसत्ता के जीवन तथा अपने चारो ओर के जगत के विषय में हमारा समस्त दृष्टिकोण व् अनुभव भी परिवर्तित हो जाता है ।

आत्मा की एक नयी भूमिका में जन्म लेकर हम एक नयी प्रकृति धारण कर लेते हैं ; क्योंकि आत्मा की भूमिका के आधार पर ही प्रकृति की भूमिका होती है।

जड़तत्व से प्राण , प्राण से मन, और बद्ध मन से मुक्त बुद्धि की ओर होने होनेवाले विश्व आरोहण के प्रत्येक अवस्था संक्रमण के समय ज्यों ज्यों प्रसुप्त या अर्ध व्यक्त या पहले से ही व्यक्त आत्मा सत्ता के अधिकाधिक उच्च स्तर की ओर उठती है त्यों त्यों प्रकृति भी सत्ता की उत्कृष्टतर क्रिया , विशालतर चेतना व् बृहत्तर शक्ति में, उसके गहनतर क्षेत्र व् विस्तृत्तर आनंद में उन्नीत हो जाती है ।

मनोमय पुरुष का विज्ञानमय पुरुष में संक्रमण का तात्पर्य यह है कि हमारे ऊपर विराट अज्ञान का जो प्रभुत्व है उसके अंतिम आवरण को भी उतार फेकना । जगद्विषयक सत्य में तथा अंधकार , असत्य, दुःख या भ्रम से अभेद्य एक असीम व् सनातन चेतना में दृढ़ता से प्रतिष्ठित होना ।

 

पांचवा अनुवाक : (तैतरीय उपनिषद ) 

इस अनुवाक में शरीर के ‘विज्ञानमय कोश’ का वर्णन है। विज्ञान के द्वारा ही यज्ञों और कर्मों की वृद्धि होती है। समस्त देवगण विज्ञान को ब्रह्म-रूप में मानकर उसकी उपासना करते हैं। विज्ञानमय शरीर में ‘आत्मा’ ही ब्रह्म-रूप है। ‘प्रेम’ उस विज्ञानमय शरीर का सिर है, ‘आमोद’ दाहिना पंख है, ‘प्रमोद’ बायां पंख है, ‘आनन्द’ मध्य भाग है और ‘ब्रह्म’ ही उसकी पूंछ, अर्थात आधार है। उसे जानने वाला समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

४. विज्ञानमय कोश(देह में स्थित पंचकोश – नर से नारायण बनाने का मार्ग पञ्च कोश जागरण)

 

भाव प्रवाह। विज्ञानमय कोश चेतन की तरह है जिसे अतीन्द्रिय- क्षमता एवं भाव संवेदना के रूप में जाना जाता है। विज्ञानमय और आनन्दमय कोश का सम्बन्ध सूक्ष्म जगत् से ब्रह्मचेतना से है। सहानुभूति की संवेदना, सहृदयता और सज्जनता का सम्बन्ध हृदय से है। यही हृदय एवं भाव संस्थान अध्यात्म शास्त्र में विज्ञानमय कोश कहलाता है। परिष्कृत हृदय- चक्र में उत्पन्न चुम्बकत्व ही दैवी तत्त्वों को सूक्ष्म जगत् से आकर्षित करता और आत्मसत्ता में भर लेने की प्रक्रियाएँ सम्पन्न करता है।

श्रद्धा जितनी परिपक्व होगी- दिव्य लोक से अनुपम वरदान खिंचते चले आएँगे। अतीन्द्रिय क्षमता, दिव्य दृष्टि, सूक्ष्म जगत् से अपने प्रभाव- पराक्रम पुरुषार्थ द्वारा अवतरित होता है।

ध्यान धारणा 

विज्ञानमय कोश में सविता प्रकाश का प्रवेश ‘दीप्ति’ के रूप में माना गया है। दीप्ति प्रकाश की वह दिव्य धारा है, जिसमें प्रेरणा एवं आगे बढ़ने की शक्ति भी भरी रहती है, ऐसी क्षमता को वर्चस् कहते हैं। यह प्रेरणा से ऊँची चीज है। प्रेरणा से दिशा प्रोत्साहन देने जैसा भाव टपकता है, किन्तु वर्चस् में वह चमक है जो धकेलने, घसीटने, फेंकने, उछालने की भी सामर्थ्य रखती है।

नस- नस में रोम- रोम में दीप्ति का सच्चार, दीप्ति का प्रभाव, दिव्य भाव संवेदनाओं और अतीन्द्रिय ज्ञान के रूप में होता है। दीप्ति की प्रेरणा से सद्भावनाओं का अभिवर्धन होता है और सहृदयता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ उभर कर आती हैं, ऐसी आस्था अन्तःकरण में सुदृढ़ अवस्था में होनी चाहिए। स्वयं को असीम सत्ता में व्याप्त फैला हुआ अनुभव करें। सहृदयता, श्रद्धा, दिव्य ज्ञान का विकास और स्नेह करुणा जैसी संवेदनाओं से रोमांच का शरीर में बोध हो रहा है।

विकास के आयाम

•        ग्रहण करने की शक्ति ,धारणाशक्ति ,स्मृति,कल्पना शक्ति,निरिक्षण शक्ति,परीक्षण शक्ति

•        तर्क ,अनुमान, विश्लेषण, संश्लेषण 

कार्यक्रम

 

सामाजिक विश्लेष्ण, प्रयास, फैसला, संवाद, विज्ञान मेला, प्रशिक्षण, करवाई पर शोध, चित्त की दृढ़ता, शोध, आत्म अनुशासन , कविताओं की रचना करके सुनाना,  जाँच, वुद्धिशीलता, जबावदेही, प्रयोग, प्रश्नोत्री, आत्मावलोकन, महापुरुषों का स्मरण, बूझो तो जानें, अन्ताक्षरी, भाषण, वाद-विवाद,

 

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