आनन्दमय कोष
आनन्दमय कोष
औरों के हित जो मरता है,औरों के हित जो जीता है |
उसका हर आंसू रामायण एवं
प्रत्येक कर्म गीता है |
इस अनुवाक में ‘आनन्दमय कोश’ की व्याख्या की गयी है।
ब्रह्म को ‘सत्य’ स्वीकार करने वाले सन्त
कहलाते हैं। विज्ञानमय शरीर का ‘आत्मा’
ही आनन्दमय शरीर का भी ‘आत्मा’ है। परमात्मा अनेक
रूपों में अपने आपको प्रकट करता है। उसने जगत की रचना की और उसी में प्रविष्ट हो
गया। वह वर्ण्य और अवर्ण्य से परे हो गया। किसी ने उसे ‘निराकार’ रूप माना, तो किसी ने ‘साकार’ रूप। अपनी-अपनी कल्पनाएं होने लगीं। वह आश्रय-रूप और आश्रयविहीन हो गया, चैतन्य और जड़ हो गया।
वह सत्य रूप होते हुए भी मिथ्या-रूप
हो गया। परन्तु विद्वानों का कहना है कि जो कुछ भी अनुभव में आता है, वही ‘सत्य’ है, परब्रह्म है, परमेश्वर है।----- तैतरीय उपनिषद
आत्मा के ऊपर पाँच आवरण चढे़ हुए हैं। फूलों में जिस प्रकार रंग, आकृति, गन्ध, रस, नाम आदि समग्र रूप
से समाहित होते हैं, उसी प्रकार काय
सत्ता में पाँचकोशों का समग्र समावेश कहा जा सकता है। केले के तने की अथवा प्याज
की परतों की तरह इन्हीं आवरणों से आच्छादित रहने के कारण आत्मा का प्रकाश
प्रत्यक्षतया प्रस्फुटित नहीं होने पाता। इन्हें उघाड़ दिया जाय तो आत्मा के
परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन अपने ही अन्तराल में होने लगते हैं और आत्मा के बीच
समर्पण के आधार पर एकात्मता स्थापित हो जाने के कारण भक्त और भगवान एक ही स्तर के
हो जाते हैं। नाला गंगा में मिलने के बाद गंगाजल ही बन जाता है और वैसा ही प्रभाव
दिखाने लगता है।
पाँचवाँ कोश आनन्दमय कोश है। इसका उदगम यों मस्तिष्कीय मध्यभाग
सहस्त्रार चक्र को माना गया है, जिसे कैलाश
मानसरोवर की। शेष शैय्या और क्षीर सागर की, कमल पुष्प पर तप करते ब्रह्मा की उपमा दी गई है। यह आनन्द
वस्तुतः दृष्टिकोण के परिष्कृत होने से सम्बन्धित है। कई व्यक्ति जटिल
परिस्थितियों में भी हँसते- हँसाते रहते हैं और कई पर्याप्त सुविधा साधन होते हुए भी खिझते- खिझाते रहते हैं। यह
सुसंस्कारिता और कुसंस्कारिता की प्रतिक्रिया है।
आनन्दमय कोश जीवात्मा पर चढ़ा अन्तिम आवरण है। आवरण के हटते की आत्मा को
परमात्मा रूप में परिष्कृत होने का अवसर मिल जाता है। तब उसकी स्थिति वैसी हो जाती
है जैसी कि वेदान्त में ‘अयमात्मा
ब्रह्म’ तत्त्व मसि सोहमस्मि,
सच्चिदानंदोऽहम्, शिवोऽहम् आदि उद्घोषों के अंतर्गत प्रतिपादित
की गई है । कामना ,वासना, लोभ आदि किसी भी प्रकार की
बाध्यता आनन्दमय कोष में नहीं है इसलिए वहां स्वतंत्रता ही है | स्वतंत्रता यह स्वच्छंदता
नहीं है, स्वैरविहार
नहीं है | शरीर
को इन्द्रिय सुखों में और मन को तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में आनन्द आता है।
इनका परिणाम एवं स्तर जितना ऊँचा होगा। सुख भी उतना ही अधिक मिलेगा। पर आत्मा को
इन दोनों बातों से कोई सन्तोष नहीं होता उसके आनन्द का केन्द्र तो प्रेम ही है ।
प्रेम तत्त्व का जिसे जितना रसास्वादन उपलब्ध हुआ,
उसकी
आत्मा उतनी ही आनन्द विभोर रहने लगती हैं। पति-पत्नी के बीच काम-क्रीड़ा का, रूप शृंगार का,
उपयोगिता
और लाभ का भी एक आकर्षण रहता है पर इतना मात्र ही आधार दोनों के बीच रहे तो उसमें
अलौकिक अनुभूति नहीं रहती । इन आधारों के शिथिल होते ही वे बन्धन ढीले पड़ने लगते
हैं और उपेक्षा, मन मुटाव,
परित्याग
एवं शत्रुता क अवसर भी आ जाते हैं। किन्तु यदि दोनों के बीच प्रेम का आधार हो तो
अनेक त्रुटियों और कर्मियों के रहते हुए भी एक दूसरे पर जान देते हैं और दो शरीर
एक प्राण रहकर स्वर्गीय सन्तोष का अनुभव करते रहते है। इस प्रेम का एक ही आनन्द
उन्हें इतना अधिक रहता है कि गरीबी आदि के अनेक अभावों के रहते हुए भी उन्हें
अमीरी जैसा भान होता रहता हैं।
आनन्दमय कोश आत्मा की उस
मूलभूत स्थिति की अनुभूति है, जिसे आत्मा का
वास्तविक स्वरूप कह सकते हैं, जिसे आत्मा का
वास्तविक स्वरूप कह सकते हैं। सामान्य जीवधारी यहाँ तक कि अधिकांश मनुष्य भी अपने
आपको शरीर मात्र मानते हैं और उसी के सुखदुख में सफलता असफलता अनुभव करते रहते
हैं। आकांक्षाऐं, विचारणाऐं एवं
क्रियाऐं इसी छोटे क्षेत्र तक सीमाबद्ध रहती हैं। यही भवबन्धन है। इसी कुचक्र में
जीव को विविध विधि त्रास सहने पड़ते हैं। आनन्दमय कोश जागृत होने पर जीव अपने को
अविनाशी ईश्वर अंश, सत्य, शिव, सुन्दर मानता है।
शरीर, मन और साधन एवं सम्पर्क परिकर को मात्र जीवनोदेश्य के उपकरण
मानता है। यह स्थिति ही आत्म ज्ञान कहलाती है। यह उपलब्ध होने पर मनुष्य हर घडी़
सन्तुष्ट एवं उल्लसित पाया जाता है। जीवन मंच पर वह अपना अभिनय करता रहता है। उसकी
संवेदनाऐं भक्तियोग, विचारणाएं, ज्ञान और क्रियाऐं कर्म योग जैसी उच्च स्तरीय बन जाती हैं।
आनन्दमय कोष चित्त है,सबल
ब्रह्म है | यह कोष आत्मतत्व के प्रकाश से आलोकित है | मनुष्य के व्यक्तितव की यह सबसे प्रगत अवस्था
है |
1 चित्त को शुद्ध करना – चित्त पर सभी प्रकार के संस्कार होते हैं | ये ज्ञानज,
कर्मज
और भावज होते हैं | चित्त पर पूर्वजन्म के
संस्कार भी होते हैं और अनुवांशिक संस्कार भी होते हैं|
इन
संस्कारों से चित्त को मुक्त करना ही चित्त शुद्ध करना है |
2 चित्त शुद्ध होते ही अपना
मूल स्वरूप प्रकट करता है | वह है
प्रेमस्वरूप, आनन्दस्वरूप,
सोंदर्यबोध से युक्त, स्वतंत्र और सहज इस स्थिति में सृजन शीलता का
विकास होता है |
अपनी
ब्राह्मी चेतना, बह्म सत्ता का भान होने से आत्मसत्ता में
संव्याप्त परमात्मा का दर्शन होता है।
संसार
के प्राणियों और पदार्थों के साथ अपने वास्तविक सम्बन्धों का तत्त्वज्ञान भी हो
जाता है। इस कोश के परिष्कृत होने पर एक आनन्द भरी मस्ती छाई रहती है। ईश्वर इच्छा
मानकर प्रखरकर्त्तव्य- परायण;
किन्तु
नितान्त वैरागी की तरह काम करते हैं। स्थितप्रज्ञ की स्थिति आ जाती है। आनन्दमय
कोश की ध्यान धारणा से व्यक्तित्व में ऐसे परिवर्तन आरम्भ होते हैं, जिसके सहारे क्रमिक गति से बढ़ते हुए धरती पर
रहने वाले देवता के रूप में आदर्श जीवनयापन कर सकने का सौभाग्य मिलता है।
Ø आनन्दमय
कोष के विकास के तत्व
1.
अन्नमय से लेकर विज्ञानमय कोशों का सम्यक विकास आनन्दमय कोष के विकास का
मार्ग सरल बनता है | इसलिए उन्ही कोषों का
विकास करने की और ध्यान देना चाहिए |
2.
स्वार्थ त्याग की वृति और सेवाभाव और सेवाकार्य
चित्त को शुद्ध करते हैं |
3.
ध्यान जब परिपक्व होता है तो समाधि होती है | समाधि से चित्त शुद्ध होता है, संस्कार द्ग्द्बीज होते है |
4.
निरपेक्षभाव से कर्म करने सी चित्त शुद्ध होता
है |
5.
भक्ति और प्रेम से चित्त शुद्ध होता है |
6.
वैसे तो ‘
आहार
शुद्धौ सत्व शुद्धि:’ ऐसी
भी शास्त्रवचन है |
प्रेम की निर्झरिणी
माता
और बच्चे के बीच प्रेम की जो निर्झर बहती रहती हैं। उसके आनन्द में माता विभोर हो
जाती है और अपने को सर्व सुख सम्पन्न अनुभव करती है। बच्चे को उदर में रखने, अपने रक्त,
माँस
में से उसका देह बनाने, प्रसव-कष्ट सहने, लालन-पालन करने और अपनी छाती का रम्र निचोड़कर
पिलाने से उसे निरन्तर क्षति एवं परेशानी ही उठानी पड़ती है। फिर भी बच्चे के
माध्यम से अपना प्रेम प्रस्फुटित करने में जो आनन्द उसे आता है उसकी तुलना से वह
कष्ट सहन तुच्छ ही लगता है। प्रेम प्रकट करने का अवसर न पाने के कारण ही सन्तान
हीन नर-नारी
असन्तुष्ट देखे जाते हैं। वैसे लौकिक दृष्टि से देखा जाय तो सन्तान के कारण माता-पिता को परेशानी के अतिरिक्त
और कुछ प्राप्त नहीं होता। पर प्रेम का लाभ भी कोई सामान्य लाभ नहीं हैं। उसके
बदलें में मनुष्य बड़ी से बड़ी कुर्बानी कर सकता है। बच्चों के प्रेम से पुलकित
माता-पिता
अपनी जीवन भर की वह कमाई बच्चे को बड़ी प्रसन्नतापूर्वक दे जाते हैं जिसमें से यदि
कोई थोड़ी भी झपटना चाहता तो उन्हें भारी दुःख होता। पशु-पक्षी तक अपने बच्चों के
प्रेम में अपने आपको प्राण संकट में डालते देखे गये हैं। भाई भाई के, मित्र मित्र के बीच जहाँ सच्चा प्रेम होता है
वहाँ के अपने को असाधारण बलशाली ग्यारह बन जाते हैं। दो व्यक्तियों को हार्दिक
प्रेम और सहयोग जब कभी भी पूरी तरह मिल जाता है तो उनके आनन्द और बल का ठिकाना
नहीं रहता।
प्रेम विहीन तो पशु भी नहीं।
प्रेम की मात्रा पशुओं में भी पाई जाती है। दूध
पिलाने का समय होते ही गाय जंगल में अपना चरना छोड़कर घर बँधे हुए बछड़े के पास
लौट आती हैं। एक साथ दो पशु रहते हैं उनमें से एक मर जाय या कहीं चला जाय तो दूसरा
उसकी याद करके कई दिन तक बेचैन रहता है। छोटे बछड़े को कहीं ले जाया जाय तो गाय भी
उसके पीछे चल देती हैं। शेर, भेड़िये
आदि पति-पत्नी
की भाँति जोड़ा बनाकर रहते हैं। एक बिछुड़ जाय तो दूसरा उद्विग्न हो जाता हैं।
सारस, बतख, तोता, गौरैया आदि पक्षी भी दाम्पत्य जीवन व्यतीत करते
हैं और जब मादा अण्डे देती हैं और उन्हीं पर बैठी रहती है तो नर पक्षी उसके लिये
भोजन-सामग्री
जुटाता रहता है। अंडे में से निकले हुए बच्चे जब तक उड़ने नहीं लगते तब तक चिड़िया
ही अपनी चोंच में भोजन लाकर घोंसले में बैठे हुए बच्चे के मुँह में डाल देती हैं।
हाथी अपने झुंड के एक सदस्य पर मुसीबत आते ही उसकी सहायता के लिए एकत्रित हो जाते
हैं। बन्दरों में भी परस्पर ऐसी ही सहयोग भावना देखी गई है। एक कसे छोड़ने ने सभी
बदला लेने आते हैं। चरवाहा पर कोई भेड़िया या चीता आक्रमण करे तो गाय का झुंड उसे
अपने बीच में ले लेता हैं और स्वयं ग्वाले के चारों ओर इकट्ठी होकर सींगों से उस
हिंसक पशु पर आक्रमण करती हैं । किसी भी पशु-पक्षी के लिये अपने को जोखिम
में डालकर लड़ने आती हैं। साँप के जोड़े में से एक को मार दिया जाय तो दूसरा इसका
बदला लेता देखा गया हैं।
भूलोक का अमृत
प्रेम इस लोक का अमृत है। थोड़ी भी चेतना
जिनमें जागृत हो चुकी हैं ऐसे पशु-पक्षी तक प्रेम का रस जानते हैं। चींटी, मधुमक्खी,
तितली, पतंग और भौंरे जैसे कीड़े भी यह जानते हैं कि
प्रेम का रस कितना मधुर है। फिर मनुष्य के लिये तो वह अमृत ही हैं। प्यार की प्यास
प्रत्येक हृदय की अध्यात्म प्यास है उसे जो प्राप्त कर सका वह धन्य हो गया। जिसे
प्यार नहीं मिला उस अभागे मनुष्य ने भले ही धन-दौलत पाई हो, पर वस्तुतः वह दीन-दरिद्री और दयनीय ही कहा
जायेगा । जिनके माता-पिता बचपन में ही मर जाते हैं और जिन्हें
दूसरों के यहाँ उपेक्षा एवं अपमान के दिन काटने पड़े के यहाँ उपेक्षा एवं अपमान के
दिन काटने पड़े वे बालक सारे जीवन मर अशान्त ही रहते हैं। दाम्पत्य जीवन की सफलता
प्रेम में सन्निहित हैं। किसी परिवार का विनाश और उत्थान पारस्परिक प्रेम भावनाओं
पर निर्भर हैं। कोई देश समाज या संगठन अपने सदस्यों की श्रद्धा भक्ति ही पनपता
हैं। जहाँ इसका अभाव रहा वहाँ पतन, विसंगत
और नाश ही निश्चित हैं। अध्यात्म विज्ञान में मोह की निन्दा और प्रेम की प्रशंसा
की गई हैं। मोह में स्वार्थ और लोभ छिपा रहता हैं। प्रेम में त्याग और उदारता की
भावना रहती हैं। मोह में पतन हो सकता हैं पर त्याग पूर्ण निस्वार्थ प्रेम से तो
आत्मा का उत्थान एवं विकास ही सम्भव हैं। इस क्लेश पूर्ण संसार में यदि कोई रस हैं, सार है,
तथ्य
है तो वह केवल प्रेम में ही हैं, जिसके
हृदय में प्रेम-भावनाएँ
उफनती रहती हैं वही करुणा, दया, सेवा और उदारता का मूर्तिमान् देवता हैं। जिसका
हृदय निष्ठुर हैं, किसी को सुखी बनाने के लिए
जिसे कुछ त्याग करने की इच्छा नहीं होती उस निष्ठुर व्यक्ति को निश्चय ही पशु कह
सकते हैं। मानवता को कलंकित करने वाले ऐसे व्याघ्र अपना कोई स्वार्थ भले ही कर लें, आत्मिक दृष्टि से पतित ही गिने जाएँगे ।
और उनकी दुर्गति भी निश्चित हैं। ऐसे लोगों का
अशान्त अन्तःकरण जीवन में चैन तो क्षण भर के लिए भी कभी पा नहीं सकता।
भक्ति भगवान की प्राप्ति
भक्ति को अध्यात्म साधना का प्रधान अंग माना
गया है। भक्ति का अर्थ है-प्रेम भगवान प्रेम के वश में रहते है-प्रेम । भगवान प्रेम के वश
में रहते हैं। गोपबालाऐं प्रेम की रस्सी से ही बाँधकर उन्हें अपने आँगन में नचाती
थीं। मीरा ने इसी प्रेम की नौकरी देकर अपने साँवरिया को चाकर रखा था। भगवान को
कर्मकाण्ड से नहीं भक्ति के प्राप्त किया जाता है। भक्ति भावनाओं के विकास में
कर्मकाण्ड सहायक है पर बिना भक्ति भावना की पूजा निर्जीव ही रहती है। भक्त का
प्रेमी होना आवश्यक है। प्रेम साधना के अभाव में अन्य साधना अधूरी ही है। साधना के
साथ भावना का समावेश आवश्यक है। भगवान के लिए किया हुआ सच्चा प्रेम, निरन्तर व्यापक होता जाता है। इष्टदेव के प्रति
किया हुआ प्रेम ध्यान या कल्पना क्षेत्र तक ही
सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान की
संतान के प्रति-समस्त
प्राणधारी के प्रति भी विकसित होता है। उसे सभी अपने लगते हैं। सब में अपना ही
आत्मा बिखरा दीखता है। सभी के प्रति अपार करुणा और ममता उसके मन में छलकती रहती
है। उदारता और सेवा उसकी एक स्वाभाविक नीति बन जाती है। ऐसे प्रेमीजन का प्रत्येक
विचार और प्रत्येक कार्य पुण्य एवं परमार्थ से ही परिपूर्ण रहता है।
करुणा और आत्मीयता
जिसके हृदय में आत्मीयता और करुणा की प्रेम-भावना उमड़ने लगी उसने भगवान
को प्राप्त करने की मंजिल पूरी कर ली। उसने अपने लिए इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग
अवतरित कर लिया। जिसे अपने चारों ओर प्रेम-पात्र ही दीखते हैं उन्हें देव लोक की तलाश
अभीष्ट नहीं, उसे तो अपने चारों ओर देवता ही देवता बैठे
दीखते हैं। हो सकता है कि दगाबाजी दुनियाँ उनकी सज्जनता का शोषण करे, ठगे। पर कितना ही ठगा जाने पर भी वे नफे में
रहते हैं। दानी कर्ण, सत्यवादी-हरिश्चन्द्र त्यागी दधीचि, भक्त मोरध्वज दूसरों के द्वारा भले ही ठगे गये
हों पर वे अनेकों ‘कमाऊ पूतो’ से नफे में रहे। जितना खोया उससे अधिक ही उनने
पाया है।
आत्मिक प्रगति प्रेम-भावनाओं के विकास के साथ-साथ आगे बढ़ती है। हमें प्रेमी
बनना होगा सम्बन्धित व्यक्तियों के प्रति प्रेम का दृष्टिकोण विकसित करना पड़ेगा।
शरीर से नहीं, आत्मा से प्रेम करने की लगन लगानी होगी। अपने
इष्टदेव से प्रेम करना सीखना होगा, इसी
में आनन्द है आनन्दमय कोश का चौथा आवरण प्रेमीजन है खोज पाते है। उन्हें ही ब्रह्मानन्द
और सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है।
गतिविधियाँ
:-
रक्त दान, समाज
सेवा, प्रार्थना, भजन
गाना, ॐ का जाप, शोभा
यात्रा, सद्संगती, काम
ही पूजा है, तनाव मुक्त जीवन, मानवता
की सेवा, देश दर्शन, मंदिरों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों
एवं मस्जिदों की सेवा, जन्मदिन भारतीय पद्दति से
मनाना, स्वदेशी भाव, समर्पण
भाव, वृक्षारोपण, पशु-पक्षियों
की देखभाल |
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